(राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0 प्र0 लखनऊ)
सुरक्षित
अपील संख्या 1347/2003
मेसर्स प्लस कम्प्यूटर फियूचर ( द्वारा श्री संजीव जैन) 61, सेन्ट्रल रोड, भोगल, न्यू दिल्ली। 110014
…अपीलार्थी/विपक्षी
बनाम
श्री आर0पी0 जैन, पुत्र श्री बुद्ध प्रकाश जैन, डिगम्बर जैन कालेज बड़ौत, निवासी- 08 सी, टीचर्स कालोनी, नेहरू रोड, बड़ौत तहसील बड़ौत, जिला बागपत, उत्तर प्रदेश।
.........प्रत्यर्थी/परिवादी
समक्ष:
1. मा0 श्री जितेन्द्र नाथ सिन्हा, पीठासीन सदस्य ।
2. मा0 श्री संजय कुमार, सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : विद्वान अधिवक्ता श्री आर0के0 गुप्ता।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित : विद्वान अधिवक्ता श्री वी0एस0 विसारिया।
दिनांक:- 22-01-2016
मा0 श्री संजय कुमार, सदस्य द्वारा उदघोषित ।
निर्णय
परिवाद सं0 191/2002 प्रो0 आर0पी0 जैन बनाम प्लस कम्प्यूटर फियूचर में जिला मंच मेरठ द्वारा दिनांक 28/04/2003 को निर्णय पारित करते हुए निम्नलिखित आदेश पारित किया गया:-
‘’ एतद्द्वारा परिवादी का परिवाद स्वीकार किया जाता है तथा विपक्षी को आदेश दिया जाता है कि वे परिवादी को प्रश्नगत कम्प्यूटर की कीमत अंकन 34,000/ रूपये एक माह में अदा करें इसके अलावा पांच हजार रूपये बतौर हर्जाना एवं दो हजार रूपये इस परिवाद का व्यय भी अदा करें। यदि उपरोक्त राशि एक माह में अदा नहीं की जाती है तो समस्त राशि पर निर्णय की तिथि से भुगतान की तिथि तक बारह प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज भी देय होगा। भुगतान के समय प्रश्नगत कम्प्यूटर विपक्षी को वापस कर दिया जायेगा। ‘’
उक्त वर्णित निर्णय/आदेश से क्षुब्ध होकर अपीलार्थी/विपक्षी द्वारा वर्तमान अपील प्रस्तुत किया गया है।
परिवाद का कथन संक्षेप में इस प्रकार है कि विपक्षी परिवादी के पास आया। विपक्षी ने परिवादी से कहा कि हम अच्छी क्वालिटी के कम्प्यूटर बनाते हैं और सभी तरह की हमारी गारण्टी है। विपक्षी के अनुरोध पर परिवादी ने विपक्षी को दिनांक 18/06/2001 को अंकन 30,000/ रूपये तथा दिनांक 23/06/2001 को अंकन 4,000/ रूपये इस प्रकार कुल 34,000/
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रूपये भुगतान बड़ौत में कर दिया। उक्त कम्प्यूटर सिस्टम परिवादी ने अपने पुत्र के लिए किया था। विपक्षी द्वारा स्वयं बडौत आकर कम्प्यूटर सिस्टम को जो उसने स्वयं तैयार किया था परिवादी के यहां इन्सटाल किया। कम्प्यूटर की सभी प्रकार की एक वर्ष की गारण्टी दी गई थी और कहा था कि यदि एक वर्ष बाद भी कोई परेशानी होगी तो उसे दूर कर दिया जायेगा। गारण्टी कार्ड मांगने पर विपक्षी ने कहा कि उक्त कम्प्यूटर चला कर देख लो एक दो महीने पसन्द आने पर गारण्टी कार्ड भरकर दे देगे और कोई परेशानी होगी तो बदलकर दूसरा कम्प्यूटर लगा देगे। एक वर्ष की गारण्टी बिल पर लिखकर दिया। प्रश्नगत कम्प्यूटर शुरू से ही ठीक प्रकार से कार्य नहीं किया। समस्या हर समय मौजूद रहती थी जिसके लिए अनेकों बार विपक्षी से शिकायत की गई। तथा विपक्षी को कई बार पत्र लिखे गये जिसका कोई जवाब नहीं आया। कम्प्यूटर बार-बार हंग होना, स्क्रीन काली हो जाना, टाइम गलत देना, बिजली शाट लगना, मदर बोर्ड ठीक कार्य न करना, हेड फोन काम न करना, यू0पी0एस0 डिफेक्टिव होना, टेली भाषाएं गायब होना, आदि अनेकों कमियां उसमें मौजूद थी। विपक्षी ने दो तीन बार अपना सर्विस इंजीनियर भेजा और कुछ पुर्जे भी बदले किन्तु फिर भी समस्या कम नहीं हुई और विपक्षी के इंजीनियर भी उसे ठीक नहीं कर पाये। विपक्षी ने सिस्टम में डिफैक्टिव पुर्जे डालकर उल्टा सीधा सिस्टम फीट करके परिवादी के यहां इन्सटाल कर दिया और चूंकि विपक्षी पर परिवादी को पूर्ण भरोसा था जिसका नाजायज फायदा विपक्षी ने उठाया। विपक्षी द्वारा ऐसा करके जानबूझकर लापरवाही का परिचय देते हुए सेवा में कमी की गई है।
विपक्षी/अपीलार्थी जिला मंच के समक्ष उपस्थित होकर अपना प्रतिवाद पत्र प्रस्तुत किया तथा यह अभिवचन किया कि परिवाद का सत्यापन नहीं कराया गया है अत: परिवाद खण्डित होने योग्य है। मौजूदा परिवाद कम्प्यूटर में खराबी से संबंधित है इसलिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा- बी-(1) (सी) के अनुसार परिवाद प्रस्तुत करने से पहले कार्यवाही की जानी चाहिए थी जो नहीं की गई है। परिवादी द्वारा जो बात अपने परिवाद पत्र में लिखी गई है वह गलत एवं निराधार है और वास्तविकता यह है कि विपक्षी कम्प्यूटर बेचने एवं सर्विस का कार्य करते है और विपक्षी ने अनेकों कम्प्यूटर बेचते हैं और कोई शिकायत नहीं मिली। परिवादी ने अंकन 34,000/ रूपये का कम्प्यूटर खरीदने का आर्डर दिल्ली में दिया था जिस पर एक वर्ष की वारन्टी दी गई थी जो केवल कम्प्यूटर को ठीक करने की बाबत थी कोई पुर्जे आदि बदलने के संबंध में नहीं थी। यू0पी0एस0 का कम्प्यूटर के चलने से कोई संबंध नहीं होता है उसके बिना भी कंप्यूटर सुचारू रूप से कार्य करता है। हेडफोन परिवादी ने विपक्षी से नहीं खरीदा था अत:
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उसकी शिकायत की जिम्मेदारी विपक्षी की नहीं है। कम्प्यूटर को चलाने वाला व्यक्ति सक्षम नहीं था इसलिए कम्प्यूटर में खराबी आई जिसमें विपक्षी की कोई गलती नहीं है और परिवादी की लापरवाही व मशीनरी को गलत तौर पर इस्तेमाल करने के कारण हुआ। जिसकी कोई जिम्मेदारी विपक्षी की नहीं बनती है और परिवादी का परिवाद खण्डित होने योग्य है।
अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री आर0के0 गुप्ता उपस्थित है। प्रत्यर्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री वी0एस0 विसारिया उपस्थित हैं। उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्तागण की बहस को विस्तारपूर्वक सुना गया एवं प्रश्नगत निर्णय एवं पत्रावली में उपलब्ध अभिलेखों का गंभीरता से परिशीलन किया गया।
अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क दिया कि प्रत्यर्थी/परिवादी ने एक कम्प्यूटर नई दिल्ली से क्रय किया है जिसमें कुछ त्रुटियां आई थी। जिसको अपीलार्थी/विपक्षी ने अपने इंजीनियर को दिनांक 15/09/2001 को भेजकर कंप्यूटर में आई दोष को दूर कर दिया था। प्रत्यर्थी/परिवादी जनपद मेरठ का रहने वाला है जिसके कारण परिवाद जिला फोरम मेरठ के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। जिला फोरम मेरठ को परिवाद की सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार प्राप्त नहीं है क्योंकि प्रश्नगत कम्प्यूटर सेन्ट्रल रोड, भोगल, न्यू दिल्ली से खरीदा गया है। यदि कम्प्यूटर में कोई दोष या कम्प्यूटर से संबंधित विवाद उत्पन्न होता है तब जिला फोरम नई दिल्ली को सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार प्राप्त है। जिला फोरम मेरठ के समक्ष परिवाद पोषणीय नहीं था। जिला फोरम मेरठ का निर्णय/आदेश खण्डित करने योग्य है।
प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क दिया कि परिवादी/प्रत्यर्थी ने नई दिल्ली से कम्प्यूटर खरीदा था। परिवादी जनपद मेरठ का रहने वाला है इसलिए परिवाद की सुनवाई मेरठ में हुई है। जिला फोरम का निर्णय/आदेश सही एवं उचित है। अपीलार्थी की अपील खारिज होने योग्य है।
आधार अपील एवं संपूर्ण पत्रावली का परिशीलन किया जिससे यह प्रतीत होता है कि परिवादी/प्रत्यर्थी ने अपीलार्थी/विपक्षी से एक कम्प्यूटर सेन्ट्रल रोड, भोगल नई दिल्ली से दिनांक 18/06/2001 को क्रय किया था। जिसमे कुछ खराबियां आ गई थी जिसे अपीलार्थी/विपक्षी ने अपने इंजीनियर को भेजकर कम्प्यूटर में आई त्रुटि को दूर किया था।
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सोनिक सर्जिकल बनाम नेशनल इन्श्योरेन्स कंपनी लि0, नेशनल कमीशन जजमेंट 2010 (एस0सी0) 82 में यह विधि व्यवस्था प्रतिपादित किया है कि:-
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Moreover, even if it had application, in our opinion, that will not help the case of the appellant. Learned counsel for the appellant submitted that the respondent- insurance company has a branch office at Chandigarh and hence under the amended Section 17 (2) the complaint could have been filed in Chandigarh. We regret, we cannot agree with the learned counsel for the appellant. In our opinion, an interpretation has to be given to the amended Section 17 (2) (b) of the Act, which does not lead to an absurd consequence. If the contention of the learned counsel for the appellant is accepted, it will mean that even if a cause of action has arisen in Ambala, then too the complainant can file a claim petition even in Tamil Nadu or Gauhati or anywhere in India where a branch office of the insurance company is situated. We cannot agree with this contention. It will lead to absurd consequences and lead to bench hunting. In our opinion, the expression ‘branch office’ in the amended Section 17(2) would mean the branch office where the cause of action has arisen. No doubt this would be departing from the plain and literal words of Section 17 (2) (b) of the Act but such departure is some times necessary (as it is in this case) to avoid absurdity. [vide G.P. Singh’s Principles of Statutory Interpretation, Ninth Edition, 2004 P. 79]
अपीलार्थी/विपक्षी का यह तर्क कि जिला फोरम मेरठ को प्रश्नगत परिवाद की सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार प्राप्त नहीं था। यह तर्क स्वीकार करने योग्य है क्योंकि प्रश्नगत कम्प्यूटर दिनांक 18/06/2001 को सेन्ट्रल रोड, भोगल नई दिल्ली से खरीदी गई थी। इसलिए कम्प्यूटर में आई दोष संबंधित विवाद की सुनवाई नई दिल्ली फोरम को प्राप्त है। जिला फोरम मेरठ को परिवाद की सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार प्राप्त नहीं था। अपीलार्थी के तर्क में बल पाया जाता है। अपील स्वीकार किये जाने योग्य है।
आदेश
अपील स्वीकार की जाती है। परिवाद सं0 191/2002 प्रो0 आर0पी0 जैन बनाम प्लस कम्प्यूटर फियूचर में जिला मंच मेरठ द्वारा पारित निर्णय/आदेश दिनांक 28/04/2003 को अपास्त किया जाता है।
(जितेन्द्र नाथ सिन्हा) (संजय कुमार)
पीठा0 सदस्य सदस्य सुभाष आशु0 कोर्ट नं0 3