जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण फोरम, कोरबा (छ0ग0)
प्रकरण क्रमांक:- CC/14/40
प्रस्तुति दिनांक:- 28/05/2014
समक्ष:- छबिलाल पटेल, अध्यक्ष,
श्रीमती अंजू गबेल, सदस्य,
श्री राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय, सदस्य
श्रीमती सुमित्रा देवी, उम्र-51 वर्ष,
पति - रामनिवास अग्रवाल, निवासी-दर्री, नगोईखार,
तहसील-कटघोरा, जिला–कोरबा (छ.ग.)...........................................आवेदिका/परिवादिनी
विरूद्ध
- मंडल प्रबंधक,
भारतीय जीवन बीमा निगम,
पेंशन एवं समूह बीमा इकाई, मंडल कार्यालय
पंडरी रायपुर (छ.ग.)
- आयुक्त,
नगर पालिक निगम कोरबा,
तहसील व जिला-कोरबा(छ.ग.)………………..............अनावेदकगण /विरोधीपक्षकारगण
आवेदक द्वारा श्री आदित्य शुक्ला अधिवक्ता।
अनावेदक क्रमांक 01 द्वारा श्री पी.के. अग्रवाल अधिवक्ता।
अनावेदक क्रमांक 02 द्वारा श्री ए.एन. मैठाणी अधिवक्ता।
आदेश
(आज दिनांक 25/04/2015 को पारित)
01. परिवादी/आवेदिका सुमित्रा देवी के द्वारा अपने पति रामनिवास अग्रवाल के नाम पर मिनीमाता शहरी निर्धन बीमा योजना के अंतर्गत लिये गये जनश्री समूह बीमा योजना पॉलिसी के तहत बीमाधन राशि 50,000/-रू0 का भुगतान, उक्त रामनिवास के मृत्यु के बाद नहीं कर अनावेदकगण द्वारा सेवा में कमी किये जाने के आधार पर उनसे बीमाधन राशि 50,000/-रू0, मानसिक क्षतिपूर्ति राशि 40,000/-रू0 तथा 12 प्रतिशत की दर ब्याज की राशि दिलाये जाने हेतु, यह परिवाद पत्र धारा 12 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत प्रस्तुत किया गया है।
02. अनावेदक क्रमांक 02 के द्वारा यह स्वीकार किया गया है कि उसके पास आवेदिका के पति रामनिवास के द्वारा मिनीमाता शहरी निर्धन बीमा योजना के अंतर्गत बीमा कराने हेतु आवेदन एवं अपने अंशदान की राशि 25/-रू0 माह फरवरी 2011 को जमा किया गया था। उक्त रामनिवास की मृत्यु दिनांक 03/06/2011 को हो गया है। शेष सभी बातें विवादित है।
03. परिवादी/आवेदिका का परिवाद-पत्र संक्षेप में इस प्रकार है कि उसके पति रामनिवास के द्वारा छत्तीसगढ़ शासन के योजना के अंतर्गत बी.पी.एल. कार्डधारियों को 25/-रू0 के शुल्क पर जनश्री समूह बीमा योजना का लाभ प्रदान करने की योजना का क्रियान्वयन किये जाने पर रामनिवास के द्वारा अपने लिए उक्त समूह बीमा योजना के लिए 25/-रू0 की राशि अनावेदक क्रमांक 02 के कार्यालय में नगद जमा किया गया था, जिसके आधार पर रामनिवास के आश्रित सदस्यों का बीमा अनावेदक क्रमांक 02 के माध्यम से अनावेदक क्रमांक 01 भारतीय जीवन बीमा निगम पेंशन एवं समूह बीमा इकाई, मंडल कार्यालय पंडरी रायपुर से करवाया गया था। आवेदिका के पति रामनिवास की मृत्यु दिनांक 03/06/2011को हो जाने पर उसके संबंध में बीमा राशि प्राप्त करने हेतु निवेदन करने के लिए, अनावेदक क्रमांक 02 के कार्यालय में उपस्थित होने पर उसे जानकारी दी गयी कि सामूहिक बीमा कराने हेतु प्रीमियम राशि 38,700/-रू0 चेक क्रमांक 328925 दिनांक 31/05/2011के द्वारा अनावेदक क्रमांक 01 के कर्यालय को प्रदान कर दिया गया है।आवेदिका ने उसके बाद अनावेदक क्र. 01 के समक्ष उपस्थित होकर बीमाधन राशि प्राप्त करने हेतु दावा प्रपत्र भरकर जमा की तब अनावेदक क्र. 01 के द्वारा पत्र प्रेषित कर दस्तावेजों की मांग किया गया, जिसे भी आवेदिका ने उपलब्ध करा दी, किंतु उसके बाद भी 50,000/-रू0 बीमाधन राशि का भुगतान आवेदिका को नहीं किया गया और उसे बार-बार रायपुर कार्यालय बुलाकर परेशान किया गया। इसलिए अनावेदकगण के द्वारा सेवा में कमी किये जाने के आधार पर उक्त बीमाधन राशि एवं मानसिक क्षतिपूर्ति की राशि सहित कुल 90,000/-रू0 को ब्याज सहित आवेदिका को भुगतान कराये जाने हेतु, यह परिवाद पत्र प्रस्तुत किया गया है।
04. अनावेदक क्रमांक 01 द्वारा प्रस्तुत जवाबदावा संक्षेप में इस प्रकार है कि आवेदिका ने अनावेदक क्रमांक 02 को धारा 401 नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 के प्रावधान के अनुसार यह मामला प्रस्तुत करने के पूर्व सूचना प्रस्तुत नहीं किया है, इसलिए यह परिवाद चलने योग्य नहीं होने से निरस्त किया जावे। आवेदिका के पति रामनिवास के संबंध में सामूहिक बीमा हेतु प्रीमियम की राशि का बीमा कंपनी को भुगतान हेतु चेक अनावेदक क्रमांक 02 के द्वारा उक्त रामनिवास की मृत्यु दिनांक 03/06/2011 के बाद दिनांक 20/06/2011 को पत्र के माध्यम से प्रेषित कर प्रस्तुत किया गया था, जिसे त्रुटि सुधारने के पश्चात दिनांक 07/12/2011 के पत्र के माध्यम से अनावेदक क्रमांक 02 की ओर से पुन: अनावेदक क्रमांक 01 के पास प्रेषित किया गया। इस प्रकार उक्त रामनिवास के मृत्यु के पश्चात राशि जमा करने के कारण उक्त मृतक का बीमा नहीं हो सकने से अनावेदक क्रमांक 01 कोई भी बीमाधन राशि आवेदिका को भुगतान के लिए उत्तरदायी नहीं है। बीमा कंपनी के द्वारा इसके बारे में सूचना पत्र दिनांक 02/05/2013 को आवेदिका के पुत्र रोशन अग्रवाल को प्रेषित किया गया जो उसे प्राप्त नहीं होने के कारण पुन: दिनांक 18/05/2013 को पत्र प्रेषित कर दिया गया था। इस प्रकार इस अनावेदक क्रमांक 01 के द्वारा सेवा में कोई कमी नहीं की गयी है। आवेदिका के पति की मृत्यु दिनांक 03/06/2011 को होने के बाद 02 वर्ष के अंदर परिवाद पत्र प्रस्तुत नहीं किये जाने से धारा 24ए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत यह परिवाद पत्र अवधि बाधित होने से भी सव्यय निरस्त किया जावे।
05. अनावेदक क्रमांक 02 द्वारा प्रस्तुत जवाबदावा संक्षेप में इस प्रकार है कि बी.पी.एल.कार्डधारियों को 25/-रू0 के आंशिक भुगतान पर मिनीमाता शहरी निर्धन बीमा योजना के तहत जनश्री समूह बीमा योजना अनावेदक क्रमांक 01 के द्वारा प्रारंभ किया गया था, जिसमें बी.पी.एल.कार्डधारियों को 25/-रू0, राज्य शासन के द्वारा 75/-रू0 तथा 100/-रू0 भारतीय जीवन बीमा निगम, पेंशन एवं समूह बीमा इकाई द्वारा वहन किया जाना था। इस योजना के तहत न्युनतम 25 व्यक्तियों का समूह नोडल एजेंसी अर्थात नगर पालिक निगम कोरबा के द्वारा तैयार किया जाना था। उसके बाद समूह बीमा का लाभ बीमित व्यक्ति के मृत्यु होने पर 20,000/-रू0 , दुर्घटना में मृत्यु होने पर 50,000/-रू0, स्थाई पूर्ण अपंगता होने पर 50,000/-रू0, अस्थाई अपंगता पर 25,000/-रू0 का लाभ बीमित व्यक्ति के वारिशान नामिनी को प्राप्त होना था। आवेदिका के पति रामनिवास की ओर से दिनांक 03/02/2011 को 25/-रू0 नगर पालिक निगम कोरबा में जमा किया गया था और स्वयं को उक्त समूह बीमा योजना का सदस्य बनाने के लिए निवेदन किया गया था। इसी प्रकार अन्य पात्र व्यक्तियों द्वारा भी समय-समय पर 25/-रू0 जमा कर नामांकित किया गया था। अनावेदक क्रमांक 02 के अनुसार उक्त समूह बीमा योजना के लिए आवश्यक था कि संपूर्ण राशि एक ही बार माह सितंबर तक जमा किया जाए। जिसमें हितग्राही द्वारा जमा राशि तथा नोडल एजेंसी के द्वारा दी जाने वाली अंश राशि को अनावेदक क्रमांक 01 के कार्यालय में जमा किया जाना था। रामनिवास के द्वारा जमा राशि के साथ अन्य हितग्राहियों द्वारा जमा की गयी राशि, अनावेदक क्रमांक 02 के द्वारा कुल 38,700/-रू0 दिनांक 31/05/2011 को चेक तैयार कर अनावेदक क्रमांक 01 के कार्यालय में प्रेषित किया गया तथा हितग्राहियों की सूची भी उन्हें दिया गया, किंतु अनावेदक क्रमांक 01 के द्वारा जानबूझकर उक्त राशियों को आहरित न कर तकनीकी त्रुटि बताते हुए चेक को अनावेदक क्रमांक 02 के कार्यालय में वापस कर दिये जाने पर पुन: त्रुटि सुधार पश्चात नया चेक 38,700/-रू0 का अनावेदक क्रमांक01 के कार्यालय को प्रेषित किया गया। इस प्रकार सभी हितग्राही मिनीमाता शहरी निर्धन बीमा योजना का लाभ प्राप्त करने के अधिकारी हो चुके थे। अनावेदक क्रमांक 01 के द्वारा आवेदिका को रामनिवास के मृत्यु पर देय 20,000/-रू0 की राशि का भुगतान नहीं किया गया है। इस अनावेदक के द्वारा सेवा में कमी नहीं की गयी है। आवेदिका अपने पति के सामान्य मृत्यु पर मात्र 20,000/-रू0 प्राप्त करने की अधिकारी रही है, लेकिन उसके द्वारा रामनिवास के मृत्यु दिनांक 03/06/2011 से तीन वर्ष पश्चात परिवाद पत्र प्रस्तुत करने के कारण यह परिवाद पत्र अवधि बाधित है। इसके अलावा धारा 401 नगर पालिक अधिनियम के आदेशात्मक प्रावधान के तहत परिवाद पेश करने से पहले आज्ञापक सूचना पत्र आवेदिका की ओर से अनावेदक क्रमांक 02 के पास प्रेषित नहीं किया गया और यह परिवाद पत्र पेश कर दिया गया है, इसलिए भी यह परिवाद पत्र निरस्त किया जावे।
06. परिवादी/आवेदिका की ओर से अपने परिवाद-पत्र के समर्थन में सूची अनुसार दस्तावेज तथा स्वयं का शपथ-पत्र दिनांक 28/05/2014 का पेश किया गया हैं। अनावेदक क्रमांक 01 द्वारा जवाबदावा के समर्थन में सूची अनुसार दस्तावेज तथा पी.ए. राव, मैनेजर,भारतीय जीवन बीमा निगम, मंडल कार्यालय बिलासपुर का शपथ-पत्र दिनांक 16/07/2014 का पेश किया गया है। अनावेदक क्रमांक 02 द्वारा जवाबदावा के समर्थन में सूची अनुसार दस्तावेज तथा डॉ. शिरीन लाखे, समाज कल्याण अधिकारी, नगर पालिक निगम कोरबा का शपथ-पत्र दिनांक 13/08/2014 का पेश किया गया है। उभय पक्षों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों का अवलोकन किया गया।
07. मुख्य विचारणीय प्रश्न है कि:-
क्या परिवादी/आवेदक द्वारा प्रस्तुत परिवाद-पत्र स्वीकार किये जाने योग्य है?
08. आवेदिका के द्वारा अपने पति रामनिवास के परिवार के सदस्यों का विवरण दर्शाने हेतु दस्तावेज क्रमांक ए/4 नगरीय सर्वेक्षण में शामिल गरीबी रेखा के निर्धन परिवारों को रियायती दर पर खाद्यान्न प्रदाय हेतु राशन कार्ड की फोटोप्रति प्रस्तुत किया गया है, जिसमें आवेदिका को उक्त रामनिवास अग्रवाल की पत्नि होना दर्शित है। उक्त रामनिवास के भारत निर्वाचन आयोग परिचय पत्र की फोटोप्रति दस्तावेज क्रमांक ए/5 है तथा कार्यालय नगर पालिक निगम कोरबा में 25/-रू0 नगद राशि समूह बीमा योजना के लिए जमा किये जाने की रसीद दस्तावेज क्रमांक ए/6 माह फरवरी 2011 से संबंधित है, उसे भी प्रस्तुत किया गया है। रामनिवास की मृत्यु दिनांक 03/06/2011 को हो जाने के संबंध में मृत्यु प्रमाण पत्र की फोटोप्रति दस्तावेज क्रमांक ए/1 है। उक्त रामनिवास की मृत्यु हो जाने संबंधी तथ्य को अनावेदक क्रमांक 02 की ओर से स्वीकार भी किया गया है।
09. आवेदिका के द्वारा स्वर्गीय रामनिवास के समूह बीमा योजना से संबंधित दावा राशि प्राप्त करने के लिए आवेदन पत्र प्रस्तुत किये जाने पर अनावेदक क्रमांक 01 बीमा कंपनी की ओर से दस्तावेज क्रमांक ए/2 का पत्र दिनांक 05/12/2012 का मृतक के पुत्र रोशन के पास प्रेषित किया था। उक्त पत्र के माध्यम से मृत्यु दावा विलंब से प्रस्तुत करने का कारण स्पष्ट करने हेतु तथा मूल मृत्यु प्रमाण पत्र जमा करने हेतु सूचित किया गया था। अनावेदक क्रमांक 01 की ओर से प्रस्तुत दस्तावेज क्रमांक एन ए/1 कार्यालय नगर पालिक निगम कोरबा के द्वारा अनावेदक क्रमांक 01 को प्रेषित पत्र दिनांक 07/12/2011 की फोटोप्रति है। जिसके अनुसार अनावेदक क्रमांक 02 द्वारा मिनीमाता शहरी निर्धन बीमा योजना के तहत बीमा राशि का प्रीमियम 38,700/-रू0 चेक क्रमांक 328925 दिनांक 31/05/2011 को जारी किया गया और संलग्नक 04 की मूल प्रति व सीडी के साथ आवश्यक कार्यवाही हेतु पत्र क्रमांक 5536 कोरबा दिनांक 20/06/2011 को प्रेषित किया जाना स्पष्ट होता है।
10. अनावेदक क्रमांक 01 ने उपरोक्त रामनिवास की मृत्यु दिनांक 03/06/2011 को हो जानेके बाद अनावेदक क्रमांक 02 के द्वारा बीमा प्रीमियम की राशि दिनांक 20/06/2011 के पत्र के द्वारा विलंब से अनावेदक क्रमांक 01 के पास प्रेषित किये जाने के कारण उक्त मृतक रामनिवास का उसके मृत्यु के पूर्व बीमा नहीं हो पाने के कारण कोई बीमाधन राशि आवेदिका को प्राप्त करने का अधिकार नहीं होना बताया गया है। इस तरह का पत्र दस्तावेज क्रमांक एन ए/2 को अनावेदक क्रमांक 01 के द्वारा उक्त मृतक के पुत्र रोशन अग्रवाल को दिनांक 02/05/2013 को प्रेषित किया जाना बताया गया है। इस प्रकार आवेदिका के पति रामनिवास के मृत्यु हो जाने पर अनावेदक क्र. 01 के द्वारा बीमाधन राशि भुगतान करने से इंकार कर दिया गया है।
11. अनावेदक क्रमांक 02 के द्वारा दस्तावेज क्रमांक डी/1 का प्रस्तुत किया गया है, जो अनावेदक क्रमांक 01 के द्वारा मास्टर बीमा पॉलिसी समूह जनश्री बीमा योजना से संबंधित विवरण तथा घोषणा की फोटोप्रति है। जिसके अनुसार किसी बीमित व्यक्ति की सामान्य मृत्यु होने पर 20,000/-रू0 दिये जाने का प्रावधान होना स्पष्ट होता है। जबकि दुर्घटना के कारण मृत्यु होने पर दुर्घटना हितलाभ के रूप में 50,000/-रू0 की राशि देय होना बताया गया है। उपरोक्त जनश्री बीमा योजना की मॉडल नियम को दर्शाने के लिए दस्तावेज क्रमांक डी/2 का प्रस्तुत किया गया है, तथा छत्तीसगढ़ शासन द्वारा समस्त कलेक्टर छत्तीसगढ़ को दिनांक 27/04/2002 को प्रेषित मिनीमाता शहरी निर्धन बीमा योजना के क्रियान्वयन की प्रक्रिया से संबंधित प्रावधान की फोटोप्रति दस्तावेज क्रमांक डी/3 का भी प्रस्तुत किया गया है। जिसमें सामान्य मृत्यु होने पर बीमित के नामिनी को 20,000/-रू0 बीमाधन राशि देय होना बताया गया है।
12. अनावेदक क्रमांक 02 की ओर से प्रस्तुत दस्तावेज क्रमांक डी/3 के के नियम 03 में उक्त बीमा योजना प्रति वर्ष श्रमिक दिवस अर्थात 01 मई से प्रारंभ होकर अगले वर्ष की 30 अप्रैल तक प्रभावशील रहना दर्शित है, इसी तरह नियम 04 में नोडल एजेंसी के संबंध में दिये गये प्रावधान के अनुसार नगरी निकाय नगर पालिक निगम आदि को नोडल एजेंसी के रूप में बीमित सदस्यों के लिए एवं उनकी ओर से कार्य करने हेतु अधिकृत होना बताया गया है। इसी दस्तावेज की नियम 07 के अनुसार भारतीय जीवन बीमा निगम को जैसे ही संबंधित नगरी निकाय से उक्त समूह बीमा योजना के तहत बीमा कराने वाले निर्धन व्यक्तियों की सूची संलग्नक 04 प्राप्त होता है, तो समूह के सदस्य उसी दिन से उस वर्ष के लिए बीमित होना मान्य किये जायेगे।
13. इस प्रकार यह स्पष्ट है कि आवेदिका के पति रामनिवास के द्वारा अपने जनश्री समूह बीमा हेतु 25/-रू0 की राशि माह फरवरी 2011 में जमा किये जाने के बाद उस वर्ष 01 मई 2011 से 30 अप्रैल 2012 की अवधि के लिए सामूहिक रूप से बीमा होना था, किंतु अनावेदक क्रमांक 01 के द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज क्रमांक एन ए/1 के अनुसार बीमा प्रीमियम की राशि एवं हितग्राहियों की सूची दिनांक 20/06/2011 को अनावेदक क्रमांक 02 के द्वारा बीमा कंपनी को प्रेषित किया गया, उसके पूर्व दिनांक 03/06/2011 को रामनिवास की मृत्यु हो चुकी थी। जिसके कारण अनावेदक क्रमांक 01 के द्वारा दस्तावेज क्रमांक एनए/2 का पत्र लिखकर आवेदिका के पति के बीमाधन राशि हेतु दावा राशि को देने से इंकार कर दिया गया।
14. अनावेदक क्रमांक 02 के द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज क्रमांक डी/4 अनावेदक क्रमांक 01 के पास प्रेषित 38,700/-रू0 की चेक दिनांक 31/05/2011 की फोटोप्रति है। आवेदिका ने भी उक्त चेक की फोटोप्रति दस्तावेज क्रमांक ए/3 का प्रस्तुत की है। अनावेदक क्रमांक 02 के द्वारा उपरोक्त चेक को दस्तावेज क्रमांक एनए/1 के अनुसार दिनांक 20/06/2011 को प्रेषित किया गया था, जिसे बाद में त्रुटि सुधार के बाद दिनांक 01/12/011 को उसी राशि का चेक जारी कर दिनांक 07/12/2011 को पत्र के साथ अनावेदक क्रमांक 01 के पास प्रेषित किया गया।इस प्रकार यह स्पष्ट है कि रामनिवास के मृत्यु के पूर्व उसके नाम पर समूह जनश्री बीमा योजना प्रभावशील नहीं हो सका था।
15. अनावेदक क्रमांक 02 के द्वारा आवेदिका के बीमा दावा के साथ ही अन्य 06 हितग्राहियों के बीमादावा प्रपत्रों को अनावेदक क्रमांक 01 के पास दिनांक 30/12/2011 को दस्तावेज क्रमांक डी/5 के अनुसार प्रेषित किया गया था। जिसमें रामनिवास अग्रवाल से संबंधित बीमादावा को अनुक्रमांक 02 में दर्शाया गया है। दस्तावेज क्रमांक डी/6 के अनुसार अनावेदक क्रमांक 01 के पास 38,700/-रू0 की चेक दिनांक 13/07/2011 को प्राप्त होना दर्शित है। अनावेदक क्र. 02 के द्वारा तैयार की गयी जनश्री मिनीमाता शहरी निर्धन बीमा योजना के सदस्यों की सूची दस्तावेज क्रमांक डी/7 में अनुक्रमांक 28 पर आवेदिका के पति रामनिवास का नाम दर्शाया गया है।
16. इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि अनावेदक क्रमांक 02 के पास माह फरवरी 2011 में 25/-रू0 रामनिवास के द्वारा जनश्री समूह बीमा योजना के तहत अपने बीमा कराने हेतु जमा कर दिये जाने के बाद भी, दिनांक 01/05/2011 के पूर्व उक्त राशि को उस वर्ष के बीमा पॉलिसी की प्राप्ति हेतु अनावेदक क्रमांक 01 के पास प्रेषित नहीं किया गया, बल्कि उक्त राशि को रामनिवास की मृत्यु दिनांक 03/06/2011 के काफी समय बाद दिनांक 22/06/2011 के पत्र के साथ अनावेदक क्रमांक 01 के पास प्रेषित किया गया, जिसमें भी त्रुटि होने के कारण सुधार पश्चात दिनांक 01/12/011 के पत्र दस्तोवज क्रमांक एनए/1 के अनुसार प्रेषित किया गया जिसके कारण मृतक रामनिवास के जीवन के संबंध में मास्टर बीमा पॉलिसी जारी नहीं हो सका। जिसके लिए अनावेदक क्रमांक 02 को उत्तरदायी होना पाया जाता है।
17. अनावेदक क्रमांक 01 की ओर से यह तर्क किया गया है कि रामनिवास की मृत्यु दिनांक 03/06/2011 को होने के कारण इस जिला उपभोक्ता फोरम में दिनांक 28/05/2014 को परिवाद पत्र प्रस्तुत किया गया है, वह धारा 24 ए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के प्रावधान के तहत अवधि बाधित है, इसलिए इस परिवाद पत्र को निरस्त किया जावे।
18. उपरोक्त तर्क के समर्थन में अनावेदक क्रमांक 01 की ओर से माननीय उच्चतम न्यायालय के न्याय दृष्टांत डॉ. व्ही.एन. श्रीखंडे विरूद्ध अनिता सेना फर्नाडीज 2010 (4) सीपीजे (एससी) 27, कांदीमल्ला राघवैय्या एण्ड कंपनी विरूद्ध नेशनल इश्योरेंस कंपनी एवं एक अन्य 2009 (3) सीपीजे (एससी)75, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया विरूद्ध मेसर्स बी.एस. एग्रीकल्चरल इण्डस््ट्रीज 2009(2)सीपीजे (एससी)29, एवं हरियाणा अर्बन डेव्हलपमेंट अथार्टी विरूद्ध बी.के.सूद 2006(1)एससीसी 164 प्रस्तुत किये गये हैं, इसी तरह माननीय राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग नई दिल्ली का न्याय दृष्टांत टेहरी हाइड्रो डेव्हलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड विरूद्ध न्यु इंडिया इश्योरेंस कंपनी लिमिटेड 2003(1)सीपीजे (एनसी) 31, तथा माननीय पंजाब राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग का न्याय दृष्टांत कमलेश कुमारी एवं एक अन्य विरूद्ध युनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य 2001 (2)सीपीजे 427 का प्रस्तुत किया गया है।
19. उपरोक्त न्याय दृष्टांतों के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि परिवादी के द्वारा वाद कारण उत्पन्न होने के 02 वर्ष के अंदर परिवाद पत्र प्रस्तुत किया जाना चाहिए, अन्यथा 02 वर्ष के बाद प्रस्तुत परिवाद पत्र अवधि बाधित होने से जिला उपभोक्ता फोरम के द्वारा सुनवाई योग्य नहीं होगा। वर्तमान मामले में अनावेदक क्रमांक 01 द्वारा दस्तावेज क्रमांक एनए/2 का पत्र दिनांक 02/05/2013 का प्रेषित कर रामनिवास के मृत्यु के संबंध में बीमा दावा को पहली बार अस्वीकार करने की सूचना दी गयी, ऐसी स्थिति में बीमा दावा प्रपत्रको अस्वीकार कने के दिनांक 02/05/2013 को वाद कारण उत्पन्न होने से दिनांक 28/05/2014 को आवेदिका द्वारा प्रस्तुत यह परिवाद पत्र अवधि बाधित नहीं होना पाया जाता है।
20. अनावेदकगण की ओर से यह तर्क किया गया है कि धारा 401 नगर पालिक निगम अधिनियम के प्रावधान के तहत परिवाद पेश करने के पूर्व आज्ञापक विधिक सूचना आवेदिका की ओर से प्रेषित नहीं किया गया था, इसलिए इस परिवाद पत्र को सुनवाई योग्य नहीं होने से निरस्त किया जावे। यह उल्लेखनीय है कि धारा 401 नगर पालिक अधिनियम के प्रावधान सिविल वाद प्रस्तुत किये जाने के पूर्व सूचना दिये जाने से संबंधित है। वर्तमान प्रकरण सिविल वाद न होकर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत एक परिवाद पत्र है, जिसका निराकरण संक्षिप्त प्रक्रिया के माध्यम से किया जाना होता है, इसलिए अनावेदकगण का उपरोक्त तर्क स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है।
21. वर्तमान मामला रामनिवास की मृत्यु दिनांक 03/06/2011 हो जाने पर उसकी पत्नि आवेदिका के द्वारा परिवाद पत्र अनावेदकगण के विरूद्ध उनके द्वारा सेवा में कमी किये जाने के आधार पर अनुतोष दिलाये जाने हेतु पेश है। आवेदिका ने अपने पति रामनिवास की मृत्यु को दुर्घटना के परिणाम स्वरूप होना प्रमाणित नहीं किया है, अपितु उसके मृत्यु प्रमाण पत्र दस्तावेज क्रमांक ए/1 के अनुसार सामान्य मृत्यु होना पाया जाता है। इसलिए दस्तावेज क्रमांक डी/1, डी/2, डी/3 के प्रावधानों के अनुसार आवेदिका अपने पति रामनिवास की मृत्यु के संबंध में 20,000/-रू0 की राशि प्राप्त करने की अधिकारी होना पायी जाती है। इसके साथ ही वह मानसिक क्षतिपूर्ति की राशि भी प्राप्त करने की अधिकारी है। अनावेदक क्रमांक 01बीमा कंपनी के द्वारा सेवा में कमी किये जाने का तथ्य प्रमाणित नहीं होना नहीं पाया जाता है, किंतु अनावेदक क्रमांक 02 के द्वारा आवेदिका की सेवा में कमी किये जाने का तथ्य प्रमाणित होना पाया जाता है। इसलिए क्षतिपूर्ति की राशि अदा करने के लिए अनावेदक क्रमांक 02 को ही उत्तरदायी होना पाया जाता है।
22. अत: मुख्य विचारणीय प्रश्न का निष्कर्ष ‘’हॉ’’ में दिया जाता है।
23. तदनुसार आवेदिका/परिवादी श्रीमती सुमित्रा देवी की ओर से प्रस्तुत इस परिवाद पत्र को धारा 12 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत स्वीकार किये जाने योग्य होना पाते हुए, आवेदिका के पक्ष में एवं अनावेदक क्रमांक 02 के विरूद्ध निम्नानुसार अनुतोष प्रदान किया जाता है और आदेश दिया जाता है कि:-
- आवेदिका को उसके पति रामनिवास की मृत्यु हो जाने के कारण मिनीमाता शहरी निर्धन बीमा योजना के अंतर्गत किये गये जनश्री समूह बीमा योजना के प्रावधान के तहत देय बीमाधन राशि 20,000/-रू0 को अनावेदक क्रमांक 02 आज से 02 माह के अंदर भुगतान करें। उक्त राशि के संबंध में परिवाद प्रस्तुति दिनांक 28/05/2014 से उसका भुगतान किये जाने तक 9 प्रतिशत की दर से वार्षिक ब्याज भी भुगतान करें।
- उपरोक्त आदेशका पालन उक्त अवधि में अनावेदक क्रमांक 02 के द्वारा नहीं किये जाने पर उपरोक्त राशि के संबंध में दिनांक 28/05/2014 से 12 प्रतिशत की दर से वार्षिक ब्याज देना होगा।
- आवेदिका को मानसिक क्षतिपूर्ति के रूप में 5,000/-रू. (पॉच हजार रूपये) अनावेदक क्रमांक 02 प्रदान करें।
- आवेदिका को परिवाद व्यय के रूप में 2,000/- रू. (दो हजार रूपये) अनावेदक क्रमांक 02 प्रदान करें। अनावेदक क्रमांक 01 को दायित्व से मुक्त किया जाता है। प्रकरण के परिस्थिति को देखते हुए आदेश दिया जाता है कि वह अपना व्यय स्वयं वहन करें।
(छबिलाल पटेल) (श्रीमती अंजू गबेल) (राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय)
अध्यक्ष सदस्य सदस्य