
gordhan lal filed a consumer case on 23 Apr 2015 against future gen. india ins. in the Jaipur-I Consumer Court. The case no is cc/225/2013 and the judgment uploaded on 27 May 2015.
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच, जयपुर प्रथम, जयपुर
समक्ष: श्री राकेश कुमार माथुर - अध्यक्ष
श्रीमती सीमा शर्मा - सदस्य
श्री ओमप्रकाश राजौरिया - सदस्य
परिवाद सॅंख्या: 225/2013
गोरधन लाल चैधरी पुत्र श्री कानाराम, जाति जाट, निवासी 94, पुरोहितो का मोहल्ला, जोतडो की ढाणी, मुहाना, सांगानेर, जयपुर (राज0)
परिवादी
ं बनाम
क्षेत्रीय प्रबंधक, फ्यूचर जनरली इण्डिया इन्श्योरेंस कम्पनी लि0, राॅयल वर्ड, द्वितीय मंजिल, एस.सी.रोड़, जयपुर 302001
विपक्षी
अधिवक्तागण :-
श्री शिव कुमार सिंह - परिवादी
श्री रवीन्द्र शर्मा - विपक्षी
परिवाद प्रस्तुत करने की दिनांक: 21.01.13
आदेश दिनांक: 23.04.2015
परिवाद में अंकित तथ्य संक्षेप में इस प्रकार है कि परिवादी ने विपक्षी से दिनांक 15.06.2011 से 14.06.2012 तक की अवधि के लिए अपने वाहन आर.जे. 01-जी-ए-2719 का बीमा करवाया था । उक्त ट्रक को कोरियर वाहन के रूप में चलाने के लिए क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय से गुडस केरीयर परमिट, प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण-पत्र, फिटनेस प्रमाण-पत्र प्राप्त कर रखा था । वाहन चलाने के लिए श्री शंकर लाल चैधरी को अधिकृत कर रखा था । उक्त वाहन दिनांक 23.06.2011 को किशनगढ से जयपुर आ रहा था सुबह 4.30-5.00 बचे के बीच नेवटा के आस-पास खड़ी करके चाय पी रहा था तभी एक अन्य लोडिंग केरियर ने टक्कर मार दी जिसकी वजह से परिवादी के ट्रक के आगे के हिस्से में काफी टूट-फुट हुई थी । घटना की जानकारी विपक्षी को देते हुए वाहन ठीक करवाने के लिए भेज दिया जिसमें 103480/- रूपए का खर्चा हुआ जिसका भुगतान परिवादी ने कर दिया । विपक्षी से उक्त खर्चे की राशि का क्लेम किए जाने पर विपक्षी ने क्लेम देने से यह कहते हुए मना कर दिया कि शंकरलाल चैधरी के लाईसेंस में ट्रांसपोर्ट व्हीकल की अवधि 30.04.2007 से 29.04.2007 अंकित थी तथा अदर देन ट्रांसपोर्ट व्हीकल की लाईसेंस अवधि 27.08.97 से 26.08.17 थी । परिवादी का कथन है कि यदि किसी व्यक्ति का चालक अनुज्ञप्ति दुर्घटना से पूर्व समाप्त हो जाता है तथा दुर्घटना के बाद नवीकृत कराया जाए तथा नवीनीकृत करते समय भी वह अयोग्य नहीं हो तब तक अनुज्ञप्ति का असर रहता है । इसी प्रकार का मत माननीय सर्वोच्च न्यायालय व माननीय उच्च न्यायालय का भी है । परिवादी का कथन है कि बीमा क्लेम देने से मना कर विपक्षी ने सेवादोष कारित किया है । परिवादी ने 1,03,480/- रूपए 11.07.2011 से 12 प्रतिशत ब्याज सहित, मानसिक व शारीरिक क्षतिपूर्ति स्वरूप 1,00,000/-रूपए, परिवाद व्यय 11000/- रूपए दिलवाए जाने का निवेदन किया है ।
विपक्षी की ओर से प्रश्नगत वाहन का बीमा किया जाना स्वीकार किया गया है । विपक्षी का अपने जवाब में मुख्य रूप से यह कहना है कि परिवादी के वाहन चालक का ट्रांसपोर्ट व्हीकल चलाने के लाईसेंस की वैधता दिनंाक 29.04.2010 को समाप्त हो चुकी थी और तथाकथित दुर्घटना दिनांक 23.06.2011 को घटित होना बताई गई है इससे स्पष्ट है कि वक्त दुर्घटना वाहन चालक के पास उक्त वाहन चलाने का वैध एवं प्रभावी लाईसेंस नहीं था जिसे दुर्घटना के लगभग 1 माह पश्चात नवीनीकृत करवाया गया है । विपक्षी का कथन है कि इस प्रकार परिवादी द्वारा बीमा पाॅलिसी की शर्तो का उल्लंधन किया गया है और वह कोई क्षतिपूर्ति राशि प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है ।
मंच द्वारा दोनों पक्षों की बहस सुनी गई एवं पत्रावली का अवलोकन किया गया ।
इस प्रकरण में परिवादी का बीमा दावा विपक्षी बीमा कम्पनी द्वारा इस आधार पर निरस्त कर दिया गया है कि दुर्घटना के समय अर्थात 23.06.2011 को परिवादी के वाहन चालक के पास वैध लाईसेंस नहीं था । परिवादी ने जो लाईसेंस की एक प्रति पेश की है उसमें ट्रांसपोर्ट वाहन चलाने की वैधता दिनांक 29.04.2010 को समाप्त हो गई थी । विपक्षी ने वाहन चालक शंकर लाल के नवीनीकृत लाईसेंस की फोटोप्रति प्रस्तुत की है जिसमें वाहन चालक शंकर लाल को ट्रंासपोर्ट वाहन चलाने की वैध अवधि दिनांक 04.07.11 से 03.07.2014 तक अंकित है व घटना दिनांक 23.06.2011 की है जबकि चालक का लाईसेंस दिनांक 29.04.2010 को ही कालातीत हो गया था । सेक्शन 15 मोटर व्हीकल एक्ट केे तहत यह प्रावधान है कि यदि लाईसेंस का नवीनीकरण उसकी वैधता समाप्त होने के एक माह के अंदर-अंदर करवा लिया जाता है तो उसकी वैधता लाईसेंस की वैधता समाप्त होने की दिनांक से मानी जाएगी परन्तु वर्तमान मामले में लाईसेंस का नवीनीकरण 04.07.2011 को किया गया है अर्थात करीब 6 माह के पश्चात चालक के लाईसेंस का नवीनीकरण किया गया । अत: ऐसी परिस्थिति में लाईसेंस की वैधता दिनांक 04.07.2011 से मानी जाएगी । इन तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है कि दुर्घटना के दिनांक 23.06.2011 को परिवादी के वाहन चालक के पास ट्रांसपोर्ट वाहन चालने का वैध लाईसेंस नहीं था ।
परिवादी की ओर से तर्क दिया गया है कि जिस समय दुर्घटना घटित हुई उस समय परिवादी का वाहन चालक वाहन को रोक कर चाय पीने में व्यस्त था तब एक अन्य वाहन ने उसके वाहन के टक्कर मार दी थी अत: ऐसी परिस्थिति में यह नहीं कहा जा सकता है कि दुर्घटना के वक्त परिवादी के वाहन चालक द्वारा वाहन को चलाया जा रहा था । इस तर्क में कोई सार प्रतीत नहीं होता है क्योंकि परिवादी स्वयं अपने परिवाद में यह लिखकर आया है कि वाहन चालक वाहन चलाकर किशनगढ़ से जयपुर आ रहा था तब यह दुर्घटना घटित हुई थी अर्थात वाहन को वैध लाईसेंस के बगैर चलाया जा रहा था इसमें कोई संदेह नहीं किया जा सकता है । यदि छोड़ी देर के लिए वाहन को रोक भी दिया गया हो तब भी उससे वाहन चालक द्वारा बगैर वैध लाईसेंस केे वाहन चालने का अपराध समाप्त नहीं हो जाता है ।
उपरोक्त समस्त विवेचन केे आधार पर यही निष्कर्ष निकलता है कि विपक्षी ने ट्रांसपोर्ट वाहन चलाने का लाईसेंस नहीं होने के कारण परिवादी का बीमा दावा निरस्त किया है जिसमें कोई त्रुटि नहीं पायी जाती है । अत: ऐसी परिस्थिति में विपक्षी द्वारा परिवादी का बीमा दावा निरस्त करने में कोई सेवादेाष कारित नहीं किया गया है । इस निष्कर्ष का समर्थन माननीय राष्ट्रीय आयोग के न्यायिक दृष्टांत ाा (2014) सी पी जे 57 (एन.सी.) रिलाईन्स जनरल इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड बनाम शिवकुमार एस. में प्रतिपादित कानूनीय सिद्धान्त से भी होता है ।
परिवादी की ओर से एक न्यायिक दृष्टांत एम ए सी डी 2012 (3) (पी एण्ड एस) 1380 नेशनल इंश्योरेंस कम्पनी लि0 बनाम ओम प्रकाश एण्ड अदर्स में प्रतिपादित कानूनी सिद्धान्त से वर्तमान मामले के तथ्यों के अनुसार परिवादी को कोई सहायता नहीं मिलती है ।
अत: इस समस्त विवेचन के आधार पर यही निष्कर्ष निकलता है कि विपक्षी बीमा कम्पनी द्वारा परिवादी का बीमा दावा निरस्त करने में कोई सेवादोष कारित नहीं किया गया है परिणामस्वरूप यह परिवाद सारहीन होने के कारण अस्वीकार किया जाता है।
निर्णय आज दिनांक 23.04.2015 को लिखाकर सुनाया गया।
( ओ.पी.राजौरिया ) (श्रीमती सीमा शर्मा) (राकेश कुमार माथुर)
सदस्य सदस्य अध्यक्ष
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